श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 139: कणिकका धृतराष्ट्रको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  1.139.67 
अञ्जलि: शपथ: सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम्।
आशाकरणमित्येवं कर्तव्यं भूतिमिच्छता॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
हाथ जोड़ना, शपथ लेना, आश्वासन देना, चरणों में सिर झुकाना और आशा प्रकट करना - ये सब धन की इच्छा रखने वाले राजा के कर्तव्य हैं ॥67॥
 
Folding hands, taking oath, giving assurance, bowing head at the feet and expressing hope - all these are the duties of a king who desires wealth. ॥ 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)