श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 139: कणिकका धृतराष्ट्रको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  1.139.54 
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत:।
उत्पथप्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
यदि गुरु अभिमान से युक्त होकर उचित-अनुचित का ज्ञान न रखते हुए गलत मार्ग पर चलते हैं, तो उन्हें भी दण्ड देना उचित माना गया है ॥54॥
 
If the Guru, being full of pride, does not know what is right and wrong and follows the wrong path, then it is considered appropriate to punish him also. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)