श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 139: कणिकका धृतराष्ट्रको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.139.3 
धृतराष्ट्र उवाच
उत्सिक्ता: पाण्डवा नित्यं तेभ्योऽसूये द्विजोत्तम।
तत्र मे निश्चिततमं संधिविग्रहकारणम्।
कणिक त्वं ममाचक्ष्व करिष्ये वचनं तव॥ ३॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! पाण्डव दिन-प्रतिदिन उन्नति कर रहे हैं और सर्वत्र यश प्राप्त कर रहे हैं। इसी कारण मैं उनसे ईर्ष्या करता हूँ। कणिक! तुम भली-भाँति निर्णय करके मुझे बताओ कि मैं उनसे संधि करूँ या युद्ध करूँ? मैं तुम्हारी बात मानूँगा।
 
Dhritarashtra said - O best of the Brahmins! The Pandavas are progressing day by day and are gaining fame everywhere. This is why I am jealous of them. Kanik! You decide well and tell me whether I should enter into a treaty with them or fight? I will listen to you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)