श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 138: युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता  »  श्लोक 9-13
 
 
श्लोक  1.138.9-13 
अगस्त्यस्य धनुर्वेदे शिष्यो मम गुरु: पुरा।
अग्निवेश इति ख्यातस्तस्य शिष्योऽस्मि भारत॥ ९॥
तीर्थात् तीर्थं गमयितुमहमेतत् समुद्यत:।
तपसा यन्मया प्राप्तममोघमशनिप्रभम्॥ १०॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम यद् दहेत् पृथिवीमपि।
ददता गुरुणा चोक्तं न मनुष्येष्विदं त्वया॥ ११॥
भारद्वाज विमोक्तव्यमल्पवीर्येष्वपि प्रभो।
त्वया प्राप्तमिदं वीर दिव्यं नान्योऽर्हति त्विदम्॥ १२॥
समयस्तु त्वया रक्ष्यो मुनिसृष्टो विशाम्पते।
आचार्यदक्षिणां देहि ज्ञातिग्रामस्य पश्यत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'भारत! मेरे गुरु अग्निवेश नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्होंने पूर्वकाल में महर्षि अगस्त्य से धनुर्वेद की शिक्षा ली थी। मैं उन्हीं महान अग्निवेश का शिष्य हूँ। इसे एक सुयोग्य गुरु से दूसरे सुयोग्य शिष्य को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से मैंने तुम्हें यह ब्रह्मशिरा नामक अस्त्र दिया है, जो मुझे घोर तपस्या के पश्चात प्राप्त हुआ था। वह अमोघ अस्त्र वज्र के समान तेजस्वी है। इसमें सम्पूर्ण पृथ्वी को भस्म करने की शक्ति है। मुझे वह अस्त्र देते समय गुरु अग्निवेश ने कहा था, 'शक्तिशाली भारद्वाज! तुम इस अस्त्र का प्रयोग मनुष्यों पर न करो। इस अस्त्र का प्रयोग उन मनुष्येतर प्राणियों पर भी न करो जो कम पौरुष वाले हों।' वीर अर्जुन! यह दिव्य अस्त्र तुम्हें मुझसे प्राप्त हुआ है। इसे कोई दूसरा प्राप्त नहीं कर सकता। राजकुमार! तुम्हें भी इस अस्त्र के विषय में ऋषि द्वारा बताए गए इस नियम का पालन करना चाहिए। अब तुम अपने बंधु-बांधवों के समक्ष मुझे गुरु दक्षिणा दो।' 9-13
 
'Bharat! My Guru is famous by the name of Agnivesh. He had learnt Dhanur Veda from Maharshi Agastya in the past. I am the disciple of the same great Agnivesh. With the aim of making it available from one deserving Guru to another deserving disciple, I have given you this weapon named Brahmashira, which I had got after great penance. That infallible weapon is as bright as a thunderbolt. It has the power to burn down the entire earth. While giving me that weapon, Guru Agnivesh had said, 'Powerful Bharadwaj! You should not use this weapon on humans. Do not use this weapon even on non-human beings who are less virile.' Brave Arjun! You have received this divine weapon from me. No one else can get it. Prince! You should also follow this rule told by the sage regarding this weapon. Now you give me a Guru Dakshina in front of your brothers and relatives.' 9–13.
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