श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 138: युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.138.1-2 
वैशम्पायन उवाच
तत: संवत्सरस्यान्ते यौवराज्याय पार्थिव।
स्थापितो धृतराष्ट्रेण पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिर:॥ १॥
धृतिस्थैर्यसहिष्णुत्वादानृशंस्यात् तथार्जवात्।
भृत्यानामनुकम्पार्थं तथैव स्थिरसौहृदात्॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन! तत्पश्चात् एक वर्ष बीत जाने पर धृतराष्ट्र ने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को युवराज पद पर अभिषिक्त किया, ताकि वे अपने धैर्य, स्थिरता, सहनशीलता, दया, सरलता और अविचल सद्भाव आदि गुणों के कारण पालन करने योग्य प्रजा पर अनुग्रह करें। 1-2॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Thereafter, after one year had passed, Dhritarashtra anointed Pandu's son Yudhishthir as the crown prince to bestow favor upon the people who were worthy of being followed because of his virtues like perseverance, stability, tolerance, kindness, simplicity and unshakable harmony etc. 1-2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas