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अध्याय 133: राजकुमारोंका रंगभूमिमें अस्त्र-कौशल दिखाना
 
श्लोक 1-2:  वैशम्पायन कहते हैं, "भरत! जब द्रोण ने देखा कि धृतराष्ट्र के पुत्रों तथा पाण्डवों ने शस्त्र विद्या का प्रशिक्षण पूरा कर लिया है, तब उन्होंने कृपाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान बाह्लीक, गंगनन्दन भीष्म, महर्षि व्यास तथा विदुरजी की उपस्थिति में राजा धृतराष्ट्र से कहा-॥ 1-2॥
 
श्लोक 3-4h:  'हे राजन! आपके पुत्रों ने शस्त्रविद्या की शिक्षा प्राप्त कर ली है। कुरुश्रेष्ठ! यदि आपकी अनुमति हो, तो वे सीखी हुई शस्त्रविद्या का प्रदर्शन करें।' यह सुनकर राजा धृतराष्ट्र अत्यंत प्रसन्न मन से बोले।
 
श्लोक 4:  धृतराष्ट्र बोले - द्विजश्रेष्ठ भरद्वाजनंदन! आपने (राजकुमारों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देकर) महान कार्य किया है। 4॥
 
श्लोक 5:  जब भी आप युवा बालकों के लिए शस्त्र-शिक्षा का प्रदर्शन करना उचित समझें, जिस समय और स्थान पर आप उचित समझें, कृपया मुझे स्वयं ऐसी तैयारी करने का आदेश दें ॥5॥
 
श्लोक 6:  आज मैं अपने अंधेपन के कारण दुःखी होकर नेत्रों वाले लोगों के सुख और सौभाग्य की कामना कर रहा हूँ, क्योंकि वे मेरे पुत्रों को अस्त्र-शस्त्र विद्या में नाना प्रकार के करतब दिखाते हुए देखेंगे।॥6॥
 
श्लोक 7:  (आचार्य से ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा-) 'धर्मवत्सल विदुर! गुरु द्रोणाचार्य जैसा कार्य करने को कहें, वैसा ही करो। मेरी राय में इससे बढ़कर तुम्हें कोई दूसरा प्रिय कार्य नहीं होगा।'॥ 7॥
 
श्लोक 8:  तत्पश्चात् राजा की अनुमति लेकर विदुरजी (आचार्य द्रोण के साथ) बाहर आए। महाज्ञानी भरद्वाजनंदन द्रोण ने रंगशाला के लिए भूमि चुनकर उसकी नाप कराई। 8॥
 
श्लोक 9-12:  वह भूमि समतल थी। उस पर कोई वृक्ष या झाड़ी नहीं थी। वह उत्तर दिशा की ओर नीची थी। वक्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण ने दिंडी-घोषणा द्वारा शूरवीर समुदाय को वास्तुपूजा देखने के लिए आमंत्रित किया और उत्तम नक्षत्रों वाली तिथि को उस भूमि पर वास्तुपूजा की। तत्पश्चात् उनके शिल्पियों ने वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार उस नाट्यशाला में एक बहुत बड़े सभागृह की नींव रखी और राजा तथा राजपरिवार की स्त्रियों के बैठने के लिए सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित एक बहुत ही सुंदर भवन का निर्माण किया। जनपदवासियों ने उनके बैठने के लिए वहाँ ऊँचे और बड़े-बड़े चबूतरे बनवाए और (स्त्रियों के आने के लिए) बहुमूल्य तंबू तैयार करवाए। 9-12।
 
श्लोक 13-14:  तदनन्तर, जब नियत दिन आया, तब राजा धृतराष्ट्र अपने मन्त्रियों के साथ, भीष्मजी और आचार्य प्रवर कृपाचार्य, बाह्लीक, सोमदत्त, भूरिश्रवा आदि कौरवों और मन्त्रियों को साथ लेकर नगर से बाहर उस दिव्य सभागृह में आये। वह सभागृह मोतियों की झालरों से युक्त था, भवन बहुमूल्य रत्नों से अलंकृत था और उसकी दीवारें स्वर्णमुद्राओं से मढ़ी हुई थीं। 13-14॥
 
श्लोक 15-17:  हे विजयी वीरों में श्रेष्ठ, हे जनमेजय! परम सौभाग्यशाली गांधारी, कुन्ती तथा राजमहल की समस्त स्त्रियाँ वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर दास-दासियों तथा आवश्यक वस्तुओं के साथ महल में आईं। जैसे दिव्य अप्सराएँ मेरु पर्वत पर चढ़ती हैं, उसी प्रकार वे हर्षपूर्वक चबूतरों पर चढ़ गईं। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि चारों वर्णों के लोग राजकुमारों के अस्त्र-शस्त्र चलाने के कौशल को देखने की इच्छा से तुरंत नगर से बाहर निकल आए। क्षण भर में वहाँ बहुत बड़ी भीड़ एकत्रित हो गई॥15-17॥
 
श्लोक 18:  नाना प्रकार के वाद्यों की ध्वनि तथा लोगों की बढ़ती हुई जिज्ञासा के कारण उस समय वह जनसमूह अशांत सागर के समान प्रतीत हो रहा था।
 
श्लोक 19-20:  तत्पश्चात् श्वेत वस्त्र और श्वेत यज्ञोपवीत धारण किए हुए आचार्य द्रोण अपने पुत्र अश्वत्थामा के साथ रंगशाला में आए; मानो मेघरहित आकाश में चन्द्रमा ने मंगल के साथ पदार्पण किया हो। आचार्य के सिर के बाल और दाढ़ी-मूँछें श्वेत हो गई थीं। वे श्वेत पुष्पों और श्वेत चंदन की मालाओं से सुशोभित थे। 19-20॥
 
श्लोक 21:  बलवानों में श्रेष्ठ द्रोण ने उचित समय पर देवताओं की पूजा की और श्रेष्ठ मन्त्रज्ञ ब्राह्मणों से स्तुति करवाई ॥21॥
 
श्लोक d2-22:  उस समय राजा धृतराष्ट्र ने आचार्य द्रोण और कृपाचार्य को दक्षिणा में स्वर्ण, मणि, रत्न और नाना प्रकार के वस्त्र दिए। फिर सुखदायी स्तुति सुनाकर, दान आदि पुण्य कर्म करके बहुत से लोग नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और उपकरण लेकर उस रंगशाला में आए। 22॥
 
श्लोक 23:  तत्पश्चात् भरतवंश के श्रेष्ठ वीर राजकुमार बड़े-बड़े रथों पर सवार होकर, दस्ताने पहने, कमर में गदा बाँधे, पीठ पर तरकस रखे तथा धनुष लिये हुए, अखाड़े में आये।
 
श्लोक d3:  पुरुषोत्तम युधिष्ठिर तथा वे राजकुमार, जो मंच के मध्य में ज्येष्ठ से कनिष्ठ तक क्रम से बैठे थे, उन्होंने आचार्य द्रोण को प्रणाम किया तथा द्रोण तथा कृपाचार्य दोनों आचार्यों की यथोचित पूजा की।
 
श्लोक d4-24:  तत्पश्चात् उनका आशीर्वाद पाकर वे सब लोग प्रसन्न हो गए। तत्पश्चात् पूजनीय पुष्पों से आच्छादित शस्त्रों को प्रणाम करके स्वयं कौरवों ने पुनः लाल चंदन और पुष्पों से उनकी पूजा की। वे सब लाल चंदन से लेप किए हुए और लाल मालाओं से सुशोभित थे। सभी रथों पर लाल ध्वजाएँ लगी हुई थीं। सबके नेत्रों के कोने लाल थे। तत्पश्चात् तप्त स्वर्ण के आभूषणों से विभूषित और शत्रुओं को संताप देने वाले कौरव राजकुमारों ने आचार्य द्रोण की आज्ञा पाकर पहले अपने-अपने शस्त्र और धनुष लेकर उनकी प्रत्यंचा चढ़ाई और उन पर नाना प्रकार के आकार के बाण स्थापित करके धनुष की प्रत्यंचा को टंकारते और ताल ठोंकते हुए समस्त प्राणियों का सम्मान किया। तत्पश्चात् वे महाबली राजकुमार अपनी अत्यन्त अद्भुत अस्त्र विद्या का प्रदर्शन करने लगे॥24॥
 
श्लोक 25:  बहुत से लोग तीर लगने के डर से सिर झुकाए खड़े थे, जबकि कुछ लोग अत्यंत विस्मित होकर बिना किसी भय के सब कुछ देख रहे थे।
 
श्लोक 26:  वे राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर अपने नाम के अक्षरों से सुसज्जित नाना प्रकार के बाणों द्वारा बड़ी फुर्ती से अपने लक्ष्य पर शीघ्रतापूर्वक प्रहार करने लगे।
 
श्लोक 27:  गंधर्व नगर के समान अद्भुत धनुष-बाण धारण करने वाले राजकुमारों के उस समूह को देखकर वहाँ उपस्थित सभी दर्शक आश्चर्यचकित हो गए।
 
श्लोक 28:  जनमेजय! सैकड़ों-हजारों लोग विभिन्न स्थानों पर बैठे हुए आश्चर्यचकित नेत्रों से देखकर सहसा 'साधु-साधु (वाह-वाह)' चिल्लाने लगे।।28।।
 
श्लोक 29:  उन महाबली राजकुमारों ने पहले धनुष-बाण के करतब दिखाए। तत्पश्चात उन्होंने रथ चलाने के विभिन्न तरीके (तेज़ चालन, पीछे लाना, दाएँ-बाएँ, गोलाकार चलाना आदि) दिखाए। तत्पश्चात उन्होंने हाथी-घोड़े की पीठ पर बैठकर कुश्ती और युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया।
 
श्लोक 30:  इसके बाद वे ढाल और तलवार लेकर एक दूसरे पर आक्रमण करने लगे और शास्त्रविहित तलवार चलाने की कला (उसे ऊपर-नीचे तथा एक ओर से दूसरी ओर घुमाने की कला) का प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने रथ, हाथी, घोड़े और भूमि - सभी स्थानों पर इस युद्ध-कौशल का प्रदर्शन किया॥30॥
 
श्लोक 31:  दर्शकों ने उन सभी को ढाल और तलवार चलाते हुए देखा। उन्होंने उस कला में उनकी चपलता, चतुराई, सुंदरता, स्थिरता और मुट्ठियों की दृढ़ता देखी।
 
श्लोक 32:  तत्पश्चात्, एक-दूसरे को परास्त करने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाले दुर्योधन और भीमसेन हाथ में गदा लेकर युद्धभूमि में आए। उस समय वे एक-एक शिखर वाले दो पर्वतों के समान प्रतीत हो रहे थे। 32.
 
श्लोक 33:  दोनों महाबाहु पुरुष अपनी कमर में बल बाँधकर आमने-सामने खड़े होकर ऐसे दहाड़ रहे थे मानो दो पागल हाथी चिंघाड़ रहे हों और किसी हथिनी के लिए लड़ने को आतुर हों।
 
श्लोक 34:  वे दोनों महाबली योद्धा उस घेरे में घूमने लगे, अपनी गदाओं को दाएं-बाएं घुमाते हुए, मानो दो मदमस्त हाथी हों।
 
श्लोक 35:  विदुर उन राजकुमारों की सारी गतिविधियों के बारे में धृतराष्ट्र और पांडव माता कुंती और गांधारी को बताते रहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)