श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 132: अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.132.22 
तथेति सम्प्रतिश्रुत्य बीभत्सु: स कृताञ्जलि:।
जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरु:।
भविता त्वत्समो नान्य: पुमाँल्लोके धनुर्धर:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
तब अर्जुन ने 'तथास्तु' कहकर वैसा ही करने की प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्र को स्वीकार किया। उस समय गुरु द्रोण ने अर्जुन से पुनः यह कहा - 'संसार में तुम्हारे समान धनुर्धर कोई दूसरा पुरुष नहीं होगा'॥22॥
 
Then Arjuna said 'Tathastu' and pledged to do the same and accepted that excellent weapon with folded hands. At that time Guru Drona again said this to Arjuna - 'There will be no other man in the world who is an archer like you'॥ 22॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणग्राहमोक्षणे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणाचार्यका ग्राहसे छुटकारा नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)