श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 132: अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.132.13 
स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान् सर्वानचोदयत्।
ग्राहं हत्वा मोक्षयध्वं मामिति त्वरयन्निव॥ १३॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि वह अपने को छुड़ाने में समर्थ था, फिर भी मानो घबराकर उसने अपने सब शिष्यों से कहा, "इस ग्राह को मार डालो और मुझे बचा लो।" ॥13॥
 
Even though he was capable of freeing himself, as if in a panic he said to all his disciples, "Kill this customer and save me." ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)