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श्लोक 1.131.50  |
वैशम्पायन उवाच
मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम्।
सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान्॥ ५०॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं - 'जनमेजय! आचार्य द्रोण कुछ देर तक उस निषादपुत्र के विषय में सोचते रहे; फिर मन बनाकर वे सव्यसाची अर्जुन के साथ उसके पास गये। |
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| Vaishmpayana says - 'Janamejaya! Acharya Drona kept thinking about that son of Nishad for a while; then after making up his mind, he went to him along with Savyasachi Arjun. |
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