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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 131: द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  1.131.47 
कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन्।
रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! कुन्तीपुत्र अर्जुन ने एकलव्य को बार-बार स्मरण किया और जब वे एकान्त में द्रोण से मिले, तो उन्होंने उससे प्रेमपूर्वक बातें कीं। 47
 
Janamejaya! Kunti's son Arjuna repeatedly remembered Ekalavya and when he met Drona in private he spoke to him lovingly. 47
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)