श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 131: द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.131.45 
एकलव्य उवाच
निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुष: सुतम्।
द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
एकलव्य ने कहा- हे वीरों! आप लोग मुझे निषादराज हिरण्यधनुक का पुत्र और द्रोणाचार्य का शिष्य जानिए। मैंने धनुर्वेद में विशेष परिश्रम किया है॥ 45॥
 
Eklavya said— O heroes! You all should know me as the son of Nishadraj Hiranyadhanuka and a disciple of Dronacharya. I have put in special effort in Dhanurveda.॥ 45॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas