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mahabharat 1.131.32: परंतु धर्मज्ञ आचार्य ने उसे निषादपुत्र समझकर धनुर्विद्या में अपना शिष्य नहीं बनाया, बल्कि कौरवों को ध्यान में रखकर ही ऐसा किया॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 1.131: द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 131: द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.131.32 
न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्।
शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
परंतु धर्मज्ञ आचार्य ने उसे निषादपुत्र समझकर धनुर्विद्या में अपना शिष्य नहीं बनाया, बल्कि कौरवों को ध्यान में रखकर ही ऐसा किया॥ 32॥
 
But considering him to be the son of a Nishad, the religious Acharya did not make him his disciple in the art of archery. He did so keeping the Kauravas in mind.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)