श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 131: द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  1.131.21-22 
तं दृष्ट्वा नित्यमुद्युक्तमिष्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम्।
आहूय वचनं द्रोणो रह: सूदमभाषत॥ २१॥
अन्धकारेऽर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन।
न चाख्येयमिदं चापि मद्वाक्यं विजये त्वया॥ २२॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन को निरन्तर धनुर्विद्या का अभ्यास करते देख द्रोणाचार्य ने रसोइये को एकान्त में बुलाकर कहा, 'अर्जुन को कभी भी अन्धकार में भोजन मत परोसना और यह बात अर्जुन को कभी मत बताना।'
 
Seeing Arjuna continuously engaged in practicing archery, Dronacharya called the cook in privacy and said, 'Never serve food to Arjuna in the dark and never tell this to Arjuna.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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