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mahabharat 1.127.13: भरतवंश शिरोमणि महाराज जनमेजय! तब उन देवियों ने वन में घोर तपस्या की और शरीर त्यागकर इच्छित गति प्राप्त की॥13॥   |   mahabharat अध्याय 1.127: पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 127: पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.127.13 
ता: सुघोरं तपस्तप्त्वा देव्यो भरतसत्तम।
देहं त्यक्त्वा महाराज गतिमिष्टां ययुस्तदा॥ १३॥
 
 
अनुवाद
भरतवंश शिरोमणि महाराज जनमेजय! तब उन देवियों ने वन में घोर तपस्या की और शरीर त्यागकर इच्छित गति प्राप्त की॥13॥
 
Bharatvansh Shiromani Maharaj Janamejaya! Then those goddesses performed severe penance in the forest and left their bodies and attained the desired state. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)