श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 121: पाण्डुका कुन्तीको समझाना और कुन्तीका पतिकी आज्ञासे पुत्रोत्पत्तिके लिये धर्मदेवताका आवाहन करनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक d5-17
 
 
श्लोक  1.121.d5-17 
पाण्डुरुवाच
(धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि त्वं नो धात्री कुलस्य हि।
नमो महर्षये तस्मै येन दत्तो वरस्तव॥
न चाधर्मेण धर्मज्ञे शक्या: पालयितुं प्रजा:॥ )
अद्यैव त्वं वरारोहे प्रयतस्व यथाविधि।
धर्ममावाहय शुभे स हि लोकेषु पुण्यभाक्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
पाण्डु बोले - हे प्रिये! मैं धन्य हूँ, तुमने मुझ पर महान उपकार किया है। तुम ही मेरे वंश का पालन करोगे। उन महर्षि को नमस्कार है, जिन्होंने तुम्हें ऐसा वरदान दिया। हे धर्म के ज्ञाता! अधर्म से प्रजा का पालन नहीं हो सकता। अतः हे वररोहे! तुम आज ही इसके लिए विधिपूर्वक प्रयत्न करो। शुभे! सर्वप्रथम धर्म का आह्वान करो, क्योंकि समस्त लोकों में वही एकमात्र धर्मात्मा है।
 
Pandu said - Dear! I am blessed, you have shown me a great favour. You are the one who will take care of my lineage. Salutations to that great sage who gave you such a boon. Knower of Dharma! The people cannot be looked after by unrighteousness. Therefore, Vararohe! You should try for this today itself in a proper manner. Shubh! First of all, invoke Dharma, because he is the only righteous person in all the worlds. 17.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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