श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 121: पाण्डुका कुन्तीको समझाना और कुन्तीका पतिकी आज्ञासे पुत्रोत्पत्तिके लिये धर्मदेवताका आवाहन करनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.121.9 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता तत: कुन्ती पाण्डुं परपुरंजयम्।
प्रत्युवाच वरारोहा भर्तु: प्रियहिते रता॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर पति से प्रेम करने वाली तथा सदैव उनके हित में तत्पर रहने वाली सुन्दरी कुन्ती शत्रुओं की राजधानी जीतने वाले राजा पाण्डु से इस प्रकार बोली - ॥9॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! After being told this, the beautiful Kunti, who is loved by her husband and is always devoted to his welfare, spoke to King Pandu, who had conquered the capital of his enemies, as follows:॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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