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श्लोक 1.120.13-15  |
बभूव स हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वित:।
अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जना:॥ १३॥
व्युषिताश्वे यशोवृद्धे मनुष्येन्द्रे कुरूत्तम।
व्युषिताश्व: समुद्रान्तां विजित्येमां वसुंधराम्॥ १४॥
अपालयत् सर्ववर्णान् पिता पुत्रानिवौरसान्।
यजमानो महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| हे कुरुश्रेष्ठ! उस राजा में दस हाथियों का बल था। पुराणों के ज्ञाता विद्वान् लोग उस यशस्वी राजा व्युषिताश्व के विषय में यह महिमा गाते हैं - 'राजा व्युषिताश्व ने समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर सब जातियों का उसी प्रकार पालन किया, जैसे पिता अपने पुत्रों का करता है। उसने बड़े-बड़े यज्ञ किये और ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दान किया।॥13-15॥ |
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| ‘That king had the strength of ten elephants. O best of the Kurus! The scholars who are experts in the Puranas sing this tale of glory about the renowned king Vyushitashwa – ‘King Vyushitashwa, after conquering the entire earth up to the sea, looked after people of all castes in the same way as a father looks after his own sons. He performed big yagnas and gave a lot of wealth to the Brahmins.॥ 13-15॥ |
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