श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 120: कुन्तीका पाण्डुको व्युषिताश्वके मृत शरीरसे उसकी पतिव्रता पत्नी भद्राके द्वारा पुत्र-प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 13-15
 
 
श्लोक  1.120.13-15 
बभूव स हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वित:।
अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जना:॥ १३॥
व्युषिताश्वे यशोवृद्धे मनुष्येन्द्रे कुरूत्तम।
व्युषिताश्व: समुद्रान्तां विजित्येमां वसुंधराम्॥ १४॥
अपालयत् सर्ववर्णान् पिता पुत्रानिवौरसान्।
यजमानो महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! उस राजा में दस हाथियों का बल था। पुराणों के ज्ञाता विद्वान् लोग उस यशस्वी राजा व्युषिताश्व के विषय में यह महिमा गाते हैं - 'राजा व्युषिताश्व ने समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर सब जातियों का उसी प्रकार पालन किया, जैसे पिता अपने पुत्रों का करता है। उसने बड़े-बड़े यज्ञ किये और ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दान किया।॥13-15॥
 
‘That king had the strength of ten elephants. O best of the Kurus! The scholars who are experts in the Puranas sing this tale of glory about the renowned king Vyushitashwa – ‘King Vyushitashwa, after conquering the entire earth up to the sea, looked after people of all castes in the same way as a father looks after his own sons. He performed big yagnas and gave a lot of wealth to the Brahmins.॥ 13-15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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