श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 120: कुन्तीका पाण्डुको व्युषिताश्वके मृत शरीरसे उसकी पतिव्रता पत्नी भद्राके द्वारा पुत्र-प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  1.120.11-12 
सर्वभूतान् प्रति यथा तपन: शिशिरात्यये।
स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन् राजसत्तम:॥ ११॥
प्राच्यानुदीच्यान् पाश्चात्त्यान् दाक्षिणात्यानकालयत् ।
अश्वमेधे महायज्ञे व्युषिताश्व: प्रतापवान्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
‘राजा व्युषिताश्व समस्त प्राणियों के प्रिय थे। राजाओं में श्रेष्ठ प्रतापी व्युषिताश्व ने अश्वमेध नामक महायज्ञ में पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण – चारों दिशाओं के राजाओं को जीतकर अपने अधीन कर लिया – जैसे शीत ऋतु के अंत में सूर्यदेव समस्त प्राणियों को जीतकर उन्हें दग्ध करने लगते हैं।॥11-12॥
 
‘King Vyushitashwa was loved by all beings. The most glorious of all kings, Vyushitashwa, in the great sacrifice called Ashwamedha, conquered and brought under his control the kings of the four directions – the east, north, west and south – just as the Sun God conquers all creatures at the end of the winter season and begins to scorch them.॥ 11-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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