वैशम्पायन उवाच
पाण्डुरुत्थाय सहसा गन्तुकामो महर्षिभि:।
स्वर्गपारं तितीर्षु: स शतशृङ्गादुदङ्मुख:॥ ८॥
प्रतस्थे सह पत्नीभ्यामब्रुवंस्तं च तापसा:।
उपर्युपरि गच्छन्त: शैलराजमुदङ्मुखा:॥ ९॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! यह सुनकर राजा पाण्डु भी ऋषियों के साथ जाने के लिए सहसा उठ खड़े हुए। उनके मन में स्वर्ग से परे जाने की इच्छा उत्पन्न हुई और वे उत्तर दिशा की ओर मुड़कर अपनी दोनों पत्नियों के साथ शतश्रृंग पर्वत से निकल पड़े। यह देखकर हिमालय की चोटी पर उत्तर दिशा की ओर यात्रा करते हुए तपस्वी ॥8-9॥
Vaishampayana says - O King! On hearing this, King Pandu also suddenly stood up to go with the sages. A desire to go beyond heaven arose in his mind and he turned towards the north and set out from the Shatashringa mountain with his two wives. Seeing this, the ascetic sages travelling northwards on top of the Himalayas said -॥ 8-9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥