श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 119: पाण्डुका कुन्तीको पुत्र-प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका आदेश  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  1.119.28-29 
अपत्यं नाम लोकेषु प्रतिष्ठा धर्मसंहिता।
इति कुन्ति विदुर्धीरा: शाश्वतं धर्मवादिन:॥ २८॥
इष्टं दत्तं तपस्तप्तं नियमश्च स्वनुष्ठित:।
सर्वमेवानपत्यस्य न पावनमिहोच्यते॥ २९॥
 
 
अनुवाद
‘समस्त लोकों में सन्तान ही धर्म की प्रतिष्ठा है - कुन्ती! सदा धर्म का उपदेश करने वाले धैर्यवान पुरुष ऐसा मानते हैं। सन्तानहीन मनुष्य यदि इस लोक में यज्ञ, दान, तप और नियम भी करता है, तो भी उसके सभी कर्म शुद्ध नहीं माने जाते।॥ 28-29॥
 
‘In all the worlds, children are the prestige of religion – Kunti! The patient men who always preach religion believe this. Even if a person without children performs sacrifices, charity, penance and rules in this world, all his deeds are not considered pure.॥ 28-29॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas