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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  1.118.47 
राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशन:।
जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! राजकुमार पाण्डु कंद-मूल और फल खाते हुए अपनी दोनों पत्नियों के साथ वहाँ से नागशत नामक पर्वत पर चले गये।
 
Janamejaya! Prince Pandu, eating roots and fruits, went from there with his two wives to the mountain called Nagashat.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)