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mahabharat 1.118.3: हमने सुना है कि महाराज शान्तनु के यहाँ उत्पन्न मेरे पिता विचित्रवीर्य, ​​जो सदैव धर्म में तत्पर रहते थे, भी विषय-भोगों में मन लगे रहने के कारण अल्पायु में ही मर गए थे ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.118.3 
शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम।
जीवितान्तमनुप्राप्त: कामात्मैवेति न: श्रुतम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हमने सुना है कि महाराज शान्तनु के यहाँ उत्पन्न मेरे पिता विचित्रवीर्य, ​​जो सदैव धर्म में तत्पर रहते थे, भी विषय-भोगों में मन लगे रहने के कारण अल्पायु में ही मर गए थे ॥3॥
 
We have heard that my father Vichitravirya, who was born to Maharaja Shantanu, who was always devoted to religion, also died at a young age due to his mind being engrossed in sensual pleasures. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)