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mahabharat 1.118.22: जो मान या अपमान पाकर जीविका की आशा से दीन दृष्टि से दूसरे मनुष्य के पास जाता है, वह कामी मनुष्य कुत्तों के मार्ग पर चलता है ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.118.22 
सत्कृतोऽसत्कृतो वापि योऽन्यं कृपणचक्षुषा।
उपैति वृत्तिं कामात्मा स शुनां वर्तते पथि॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो मान या अपमान पाकर जीविका की आशा से दीन दृष्टि से दूसरे मनुष्य के पास जाता है, वह कामी मनुष्य कुत्तों के मार्ग पर चलता है ॥22॥
 
The one who, after receiving respect or insult, goes to another man with a humble look in the hope of livelihood, that lustful person walks on the path of dogs. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)