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mahabharat 1.118.19: मैं समस्त पापों से मुक्त हो जाऊँगा और अज्ञानजन्य समस्त बंधनों से पार हो जाऊँगा। मैं किसी के वश में न रहकर वायु की भाँति सर्वत्र विचरण करूँगा।॥19॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.118.19 
निर्मुक्त: सर्वपापेभ्यो व्यतीत: सर्ववागुरा:।
न वशे कस्यचित् तिष्ठन् सधर्मा मातरिश्वन:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
मैं समस्त पापों से मुक्त हो जाऊँगा और अज्ञानजन्य समस्त बंधनों से पार हो जाऊँगा। मैं किसी के वश में न रहकर वायु की भाँति सर्वत्र विचरण करूँगा।॥19॥
 
I shall be free from all sins and shall transcend all bonds born of ignorance. I shall roam everywhere like the wind, being not under anybody's control.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)