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mahabharat 1.118.11: मेरे मुख पर सदैव प्रसन्नता छाई रहेगी और मैं सदैव समस्त प्राणियों के कल्याण में लगा रहूँगा। मैं चारों प्रकार के जीव-जंतुओं (स्वजातीय, अण्डज, अण्डज और गर्भज) में से किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाऊँगा॥ 11॥   |   mahabharat अध्याय 1.118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 118: पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.118.11 
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रत:।
जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
मेरे मुख पर सदैव प्रसन्नता छाई रहेगी और मैं सदैव समस्त प्राणियों के कल्याण में लगा रहूँगा। मैं चारों प्रकार के जीव-जंतुओं (स्वजातीय, अण्डज, अण्डज और गर्भज) में से किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाऊँगा॥ 11॥
 
Happiness will always be spread on my face and I will always be engaged in the welfare of all beings. I will not harm any of the four types of living and non-living creatures (swedish, ovine, egg-born and womb-born)॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)