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श्लोक 1.117.34  |
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुदु:खार्तो जीवितात् स व्यमुच्यत।
मृग: पाण्डुश्च दु:खार्त: क्षणेन समपद्यत॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं: ऐसा कहकर मृगरूपी ऋषि महान शोक से पीड़ित होकर मर गए और क्षण भर में राजा पाण्डु भी शोक से व्याकुल हो गए। |
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| Vaishmpayana says: Having said this, the sage in the form of a deer became afflicted with great sorrow and died. And within a moment King Pandu too became distressed with grief. |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुमृगशापे सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुको मृगका शाप नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११७॥
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