श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 117: राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  1.117.14-15 
अगस्त्य: सत्रमासीनश्चकार मृगयामृषि:।
आरण्यान् सर्वदेवेभ्यो मृगान् प्रेषन् महावने॥ १४॥
प्रमाणदृष्टधर्मेण कथमस्मान् विगर्हसे।
अगस्त्यस्याभिचारेण युष्माकं विहितो वध:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
महर्षि अगस्त्य भी जब आखेट के लिए सत्र में दीक्षित हुए थे, तब उन्होंने भी आखेट किया था। समस्त देवताओं के हित के लिए उन्होंने सत्र में उत्पात मचाने वाले पशुओं को महान वन में भगा दिया था। अगस्त्य ऋषि के उपर्युक्त हिंसात्मक कृत्य के अनुसार मुझ क्षत्रिय के लिए तुम्हारा वध करना ही उचित है। मैं तो स्थापित धर्म के अनुसार आचरण करता हूँ, फिर भी तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो?॥14-15॥
 
Maharishi Agastya was initiated into a Satra, when he too had hunted. For the benefit of all the gods, he had driven away the animals which were causing disturbance in the Satra into the great forest. According to the above mentioned act of violence by Agastya Rishi, it is only right for me, a Kshatriya, to kill you. I behave in accordance with the established Dharma, even then why do you criticize me?॥14-15॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas