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mahabharat 1.114.7-8: वैशम्पायन बोले - राजन! एक समय की बात है, महर्षि व्यास भूख और परिश्रम से थके हुए धृतराष्ट्र के यहाँ आए। उस समय गांधारी ने भोजन और विश्राम की व्यवस्था करके उन्हें संतुष्ट किया। तब व्यास ने गांधारी से वरदान देने की इच्छा व्यक्त की। गांधारी ने अपने पति के समान सौ पुत्र मांगे। 7-8.   |   mahabharat अध्याय 1.114: धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 114: धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  1.114.7-8 
वैशम्पायन उवाच
क्षुच्छ्रमाभिपरिग्लानं द्वैपायनमुपस्थितम्॥ ७॥
तोषयामास गान्धारी व्यासस्तस्यै वरं ददौ।
सा वव्रे सदृशं भर्तु: पुत्राणां शतमात्मन:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन बोले - राजन! एक समय की बात है, महर्षि व्यास भूख और परिश्रम से थके हुए धृतराष्ट्र के यहाँ आए। उस समय गांधारी ने भोजन और विश्राम की व्यवस्था करके उन्हें संतुष्ट किया। तब व्यास ने गांधारी से वरदान देने की इच्छा व्यक्त की। गांधारी ने अपने पति के समान सौ पुत्र मांगे। 7-8.
 
Vaishampayana said - King! Once upon a time, Maharishi Vyas came to Dhritarashtra's place, tired of hunger and hard work. At that time, Gandhari satisfied him by arranging food and rest. Then Vyas expressed his desire to give a boon to Gandhari. Gandhari asked for a hundred sons like her husband. 7-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)