श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 114: धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति  »  श्लोक 41-44
 
 
श्लोक  1.114.41-44 
मासमात्रेण संजज्ञे कन्या चैका शताधिका।
गान्धार्यां क्लिश्यमानायामुदरेण विवर्धता॥ ४१॥
धृतराष्ट्रं महाराजं वैश्या पर्यचरत् किल।
तस्मिन् संवत्सरे राजन् धृतराष्ट्रान्महायशा:॥ ४२॥
जज्ञे धीमांस्ततस्तस्यां युयुत्सु: करणो नृप।
एवं पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमत:॥ ४३॥
महारथानां वीराणां कन्या चैका शताधिका।
युयुत्सुश्च महातेजा वैश्यापुत्र: प्रतापवान्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर उसी मास में गांधारी के यहां एक कन्या उत्पन्न हुई, जो सौ पुत्रों के अतिरिक्त थी। जिन दिनों गांधारी का पेट गर्भावस्था के कारण बढ़ गया था और वह पीड़ा से व्याकुल थी, उन दिनों राजा धृतराष्ट्र की सेवा में एक वैश्य जाति की स्त्री रहती थी। राजन! उसी वर्ष धृतराष्ट्र के अंश से उस वैश्य जाति की पत्नी से महाप्रतापी और बुद्धिमान युयुत्सुक उत्पन्न हुआ। जनमेजय! युयुत्सु का नाम कर्ण पड़ा। इस प्रकार बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र के सौ वीर और महाप्रतापी पुत्र हुए। उसके बाद एक कन्या उत्पन्न हुई, जो सौ पुत्रों के अतिरिक्त थी। इन सबके अतिरिक्त अत्यंत तेजस्वी वैश्यपुत्र युयुत्सु भी था। 41-44॥
 
Subsequently, in the same month, a daughter was born to Gandhari, who was in addition to a hundred sons. In the days when Gandhari's stomach had become enlarged due to pregnancy and she was in pain, there used to be a Vaishya caste woman in the service of King Dhritarashtra. Rajan! That year, from the part of Dhritarashtra, the great and intelligent Yuyutsuka was born to that Vaishya caste wife. Janamejaya! Yuyutsu was called Karan. In this way, the wise king Dhritarashtra had one hundred brave and great sons. After that a daughter was born, who was in addition to the hundred sons. Apart from all these, there was also Yuyutsu, the very brilliant Vaishyaputra. 41-44॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि गान्धारीपुत्रोत्पत्तौ चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें गान्धारीपुत्रोत्पत्तिविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११४॥

 
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