श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 114: धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति  »  श्लोक 38-40
 
 
श्लोक  1.114.38-40 
एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्॥ ३८॥
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।
स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमै:॥ ३९॥
न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वित:।
तत: पुत्रशतं पूर्णं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
‘एक पुत्र का त्याग करके इस सम्पूर्ण कुल और सम्पूर्ण जगत का कल्याण करो। नीतिशास्त्र कहता है कि सम्पूर्ण कुल के हित के लिए एक व्यक्ति का, एक ग्राम के हित के लिए एक कुल का, देश के हित के लिए एक ग्राम का तथा आत्मा के हित के लिए सम्पूर्ण जगत का त्याग कर दो।’ विदुर आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर भी पुत्र-मोह के बंधन में बँधे हुए राजा धृतराष्ट्र ने ऐसा नहीं किया। हे जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र के कुल सौ पुत्र हुए। 38-40।
 
‘By sacrificing just one son, do good to this entire clan and the entire world. Ethics says that for the good of the entire clan, sacrifice one person, for the good of a village, abandon a clan, for the good of the country, abandon a village and for the good of the soul, abandon the entire world.’ Even after Vidur and all those great Brahmins said this, King Dhritarashtra, bound by the bond of love for his son, did not do so. O Janamejaya! In this way, King Dhritarashtra had a total of hundred sons. 38-40.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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