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श्लोक 1.114.21  |
एकाधिकशतं पूर्णं यथायोगं विशाम्पते।
मांसपेश्यास्तदा राजन् क्रमश: कालपर्ययात्॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! समय के परिवर्तन से उस मांसपिंड के धीरे-धीरे आवश्यकतानुसार एक सौ एक अंग हो गए ॥21॥ |
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| Rajan! Due to the change in time, that body of flesh gradually got one hundred and one parts as per its requirement. 21॥ |
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