श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 114: धृतराष्ट्रके गान्धारीसे एक सौ पुत्र तथा एक कन्याकी तथा सेवा करनेवाली वैश्यजातीय युवतीसे युयुत्सु नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति  »  श्लोक 15-17h
 
 
श्लोक  1.114.15-17h 
गान्धार्युवाच
ज्येष्ठं कुन्तीसुतं जातं श्रुत्वा रविसमप्रभम्॥ १५॥
दु:खेन परमेणेदमुदरं घातितं मया।
शतं च किल पुत्राणां वितीर्णं मे त्वया पुरा॥ १६॥
इयं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय वै।
 
 
अनुवाद
गांधारी बोली - मुनि! मैंने सुना है कि कुंती ने सूर्य के समान तेजस्वी ज्येष्ठ पुत्र को जन्म दिया है। यह समाचार सुनकर मैंने बड़े दुःख के कारण अपने उदर पर प्रहार करके उस बालक को गिरा दिया है। पहले आपने मुझे सौ पुत्र होने का आशीर्वाद दिया था; किन्तु आज इतने दिनों के पश्चात् सौ पुत्रों के स्थान पर यह मांस का लोथड़ा मेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ है।
 
Gandhari said - Muni! I have heard that Kunti has given birth to an eldest son, who is as radiant as the Sun. On hearing this news, I have aborted the child by hitting my abdomen in great sorrow. Earlier you had blessed me to have hundred sons; but today after so many days, instead of hundred sons, this lump of flesh has been born from my womb.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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