श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक d11
 
 
श्लोक  1.110.d11 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा द्विज: स्वप्ने तत्रैवान्तरधीयत।
कर्ण: प्रबुद्धस्तं स्वप्नं चिन्तयानोऽभवत् तदा॥ )
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- स्वप्न में ऐसा कहकर ब्राह्मण वेशधारी सूर्यदेव वहाँ से अन्तर्धान हो गए। तब कर्ण जाग उठा और स्वप्न की बातों पर विचार करने लगा।
 
Vaishampayana says- Having said this in the dream, the Sun in the guise of a Brahmin disappeared from there. Then Karna woke up and started thinking about the things of the dream.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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