श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 110: कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.110.2 
पितृष्वस्रीयाय स तामनपत्याय भारत।
अग्रॺमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यं स सत्यवाक्॥ २॥
 
 
अनुवाद
भरत! सत्यवादी शूरसेन ने अपने चचेरे भाई कुन्तीभोज से, जो निःसंतान थे, पहले ही प्रतिज्ञा कर ली थी कि मैं अपनी प्रथम संतान उन्हीं को दान करूँगा॥ 2॥
 
Bharata! The truthful Shurasena had already made a vow to his cousin brother Kunti Bhoja who was childless, that he would gift his first child to him.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)