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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 106: महर्षि माण्डव्यका शूलीपर चढ़ाया जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.106.17 
श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन् किं पापं कृतवानसि।
येनेह समनुप्राप्तं शूले दु:खभयं महत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'ब्राह्मण! हम सुनना चाहते हैं कि तुमने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिसके कारण तुम्हें यहाँ भाले पर बैठकर यह महान दुःख भोगना पड़ रहा है?'॥17॥
 
'Brahmin! We wish to hear what sin you have committed, due to which you have had to undergo this great suffering of sitting here on a spear?'॥ 17॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने षडधिकशततमोऽध्याय:॥ १०६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अणीमाण्डव्योपाख्यानविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ॥ १०६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)