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अध्याय 106: महर्षि माण्डव्यका शूलीपर चढ़ाया जाना
 
श्लोक 1:  जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन् ! धर्मराज ने ऐसा कौन-सा कर्म किया था जिसके कारण उन्हें शाप मिला ? किस ब्रह्मर्षि के शाप से वे शूद्रयोनि में उत्पन्न हुए ? 1॥
 
श्लोक 2:  वैशम्पायनजी बोले - राजन्! प्राचीन काल में माण्डव्य नाम का एक प्रसिद्ध ब्राह्मण था, जो धैर्यवान, समस्त धर्मों का ज्ञाता, सत्यवादी और तपस्वी था॥2॥
 
श्लोक 3:  वे अपने आश्रम के द्वार पर एक वृक्ष के नीचे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर मौन व्रत धारण करके कठोर तपस्या करते थे। माण्डव्य जी एक महान योगी थे।
 
श्लोक 4:  ऋषि को कठोर तपस्या करते हुए कई दिन बीत गए। एक दिन, कई डाकू चोरी का माल लेकर उनके आश्रम पर आ धमके।
 
श्लोक 5-8:  जनमेजय! बहुत से सैनिक उन चोरों का पीछा कर रहे थे। कौरवश्रेष्ठ! उन डाकुओं ने चुराया हुआ माल ऋषि के आश्रम में रख दिया और रक्षक सेना के आने से पहले ही भय के मारे वहाँ छिप गए। उनके छिप जाने पर रक्षक सेना शीघ्रता से वहाँ पहुँच गई। राजन! चोरों का पीछा करने वाले लोगों ने जब तपस्या में लीन ऋषि को देखा, तो पूछा, 'ब्राह्मणश्रेष्ठ! मुझे बताइए, चोर किस मार्ग से भागे हैं? जिससे हम उस मार्ग का अनुसरण करके तीव्र गति से उनका पीछा कर सकें।' ॥5-8॥
 
श्लोक 9:  राजा! जब पहरेदारों ने उनसे इस प्रकार पूछा, तब तपस्वी महामुनि ने भला-बुरा कुछ भी नहीं कहा॥9॥
 
श्लोक 10:  तब राजा के आदमियों ने आश्रम में ही चोरों को खोजना आरम्भ किया और वहाँ चोरों और चोरी के माल को छिपा हुआ देखा॥10॥
 
श्लोक 11:  तभी पहरेदारों को ऋषि पर शक हुआ और वे उसे बाँधकर राजा के पास ले गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने राजा को सारी बात बताई और उन चोरों को भी राजा के हवाले कर दिया।
 
श्लोक 12:  राजा ने उन चोरों सहित ऋषि को भी प्राणदण्ड देने का आदेश दिया। पहरेदारों ने उस महान तपस्वी ऋषि को पहचाना नहीं और उन्हें सूली पर चढ़ा दिया॥12॥
 
श्लोक 13:  इस प्रकार रक्षकों ने ऋषि माण्डव्य को सूली पर चढ़ा दिया और सारा धन अपने साथ लेकर राजा के पास लौट आये।
 
श्लोक 14:  पुण्यात्मा ब्रह्मर्षि माण्डव्य उस भाले की नोक पर बहुत समय तक बैठे रहे। वहाँ उन्हें भोजन न मिलने पर भी उनकी मृत्यु नहीं हुई ॥14॥
 
श्लोक 15-16:  वह प्राण धारण करके ऋषियों को स्मरण मात्र से अपने पास बुलाने लगा। फाँसी के फंदे पर तप करने वाले उस महात्मा से प्रभावित होकर समस्त तपस्वी ऋषिगण अत्यन्त व्याकुल हो गए। वे रात्रि में पक्षियों का रूप धारण करके वहाँ उड़ते हुए आए और अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार अपना रूप प्रकट करके उस महाब्राह्मण ऋषि माण्डव्य से पूछने लगे॥15-16॥
 
श्लोक 17:  'ब्राह्मण! हम सुनना चाहते हैं कि तुमने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिसके कारण तुम्हें यहाँ भाले पर बैठकर यह महान दुःख भोगना पड़ रहा है?'॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)