श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 103: सत्यवतीका भीष्मसे राज्यग्रहण और संतानोत्पादनके लिये आग्रह तथा भीष्मके द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.103.22 
यथा ते कुलतन्तुश्च धर्मश्च न पराभवेत् ।
सुहृदश्च प्रहृष्येरंस्तथा कुरु परंतप॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘परंतप! आप वह उपाय करें जिससे आपकी कुल-परंपरा नष्ट न हो, धर्म की अवहेलना न हो और आपके प्रेमी-मित्र भी संतुष्ट हों।’ 22॥
 
‘Parantap! Do the solution by which the tradition of your lineage is not destroyed, religion is not disregarded and your lovers and friends are also satisfied. 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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