श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 102: भीष्मके द्वारा स्वयंवरसे काशिराजकी कन्याओंका हरण, युद्धमें सब राजाओं तथा शाल्वकी पराजय, अम्बिका और अम्बालिकाके साथ विचित्रवीर्यका विवाह तथा निधन  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  1.102.54-55 
यथा पितास्य कौरव्य: शान्तनुर्नृपसत्तम:।
सोऽचिरेणैव कालेन अत्यक्रामन्नराधिप॥ ५४॥
वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधान् द्रुमान्।
अक्षत: क्षपयित्वारीन् संख्येऽसंख्येयविक्रम:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
वे उसी प्रकार शासन करते थे, जैसे उनके पिता, पुरुषोत्तम शान्तनु राज्य करते थे । जनमेजय ! भीष्मजी थोड़े ही समय में वन, नदी, पर्वतों को पार करते हुए तथा नाना प्रकार के वृक्षों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़े । युद्ध में उनका पराक्रम अवर्णनीय था । वे स्वयं अक्षुण्ण रहते हुए भी शत्रुओं को हानि पहुँचाते थे । 54-55॥
 
He used to rule the same way as his father, the best human being, Shantanu, ruled the kingdom. Janamejaya! In a short time, Bhishmaji moved ahead, crossing forests, rivers, mountains and leaving behind different types of trees. His bravery in the war was indescribable. He himself caused harm to the enemies while remaining intact. 54-55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)