श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 101: सत्यवतीके गर्भसे चित्रांगद और विचित्रवीर्यकी उत्पत्ति, शान्तनु और चित्रांगदका निधन तथा विचित्रवीर्यका राज्याभिषेक  »  श्लोक d2-d3
 
 
श्लोक  1.101.d2-d3 
(गन्धर्व उवाच
त्वं वै सदृशनामासि युद्धं देहि नृपात्मज।
नाम चान्यत् प्रगृणीष्व यदि युद्धं न दास्यसि॥
त्वयाहं युद्धमिच्छामि त्वत्सकाशात् तु नामत:।
आगतोऽस्मि वृथाभाष्यो न गच्छेन्नामतो यथा॥ )
 
 
अनुवाद
गंधर्व ने कहा- राजकुमार! तुम्हारा नाम मेरे नाम से मिलता-जुलता है, अतः मुझे युद्ध करने का अवसर दो और यदि ऐसा न कर सको तो कोई दूसरा नाम रख लो। मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। नामों की एकता के कारण ही मैं तुम्हारे निकट आया हूँ। जो व्यक्ति मुझे व्यर्थ ही मेरे नाम से पुकारता है, वह मेरे सामने से सुरक्षित नहीं जा सकता।
 
Gandharva said- Prince! You have a name similar to mine, so give me a chance to fight and if you cannot do this then keep another name. I want to fight with you. I have come near you only because of the unity of names. A person who calls me by my name in vain cannot go safely from my presence.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas