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mahabharat 1.100.96: निषादराज! आज से मैं आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा। पुत्र न होने पर भी मैं स्वर्ग में शाश्वत निवास प्राप्त करूँगा॥ 96॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  1.100.96 
अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति।
अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
निषादराज! आज से मैं आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा। पुत्र न होने पर भी मैं स्वर्ग में शाश्वत निवास प्राप्त करूँगा॥ 96॥
 
Nishadraaj! From today onwards, I will continue my lifelong vow of celibacy. Even though I do not have a son, I will attain eternal abode in heaven.॥ 96॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)