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mahabharat 1.100.9: इन्द्र के समान यशस्वी और यशस्वी शान्तनु के राज्य में रहते हुए अन्य राजा भी स्वाभाविक रूप से दान और यज्ञ में प्रवृत्त हो गए॥9॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.100.9 
तेन कीर्तिमता शिष्टा: शक्रप्रतिमतेजसा।
यज्ञदानक्रियाशीला: समपद्यन्त भूमिपा:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र के समान यशस्वी और यशस्वी शान्तनु के राज्य में रहते हुए अन्य राजा भी स्वाभाविक रूप से दान और यज्ञ में प्रवृत्त हो गए॥9॥
 
Living under the rule of Shantanu, who was as illustrious and famous as Indra, other kings also naturally got involved in charity and sacrificial acts.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)