Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.100.85: वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! निषाद के ऐसा कहने पर गंगानन्दन देवव्रत ने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए समस्त राजाओं के समक्ष यह उचित उत्तर दिया- ॥85॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.100.85 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत।
शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! निषाद के ऐसा कहने पर गंगानन्दन देवव्रत ने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए समस्त राजाओं के समक्ष यह उचित उत्तर दिया- ॥85॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! When Nishad said this, Ganganandan Devavrata, in order to fulfil his father's desire, gave this appropriate reply in front of all the kings - ॥ 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)