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mahabharat 1.100.83: परंतप! आपका शत्रु चाहे गंधर्व हो या राक्षस, आपके क्रोध करने पर वह कभी भी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता ॥ 83॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  1.100.83 
यस्य हि त्वं सपत्न: स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा।
न स जातु चिरं जीवेत् त्वयि क्रुद्धे परंतप॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
परंतप! आपका शत्रु चाहे गंधर्व हो या राक्षस, आपके क्रोध करने पर वह कभी भी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता ॥ 83॥
 
Parantapa! Whoever is your enemy, be it a Gandharva or a demon, can never live long if you are angry. ॥ 83॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)