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mahabharat 1.100.81-82: महाबली राजा शान्तनु ने भी पहले बड़े आग्रह से सत्यवती को माँगा था; किन्तु उनके आग्रह करने पर भी मैंने उनका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था। राजकुमार! कन्या का पिता होने के नाते मैं तुमसे भी अवश्य कुछ कहूँगा। तुम दोनों के बीच जो सम्बन्ध बन रहा है, उसमें मुझे केवल एक ही दोष दिखाई देता है, वह है बलवान के साथ शत्रुता। 81-82।   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 81-82
 
 
श्लोक  1.100.81-82 
अर्थितश्चापि राजर्षि: प्रत्याख्यात: पुरा मया।
स चाप्यासीत् सत्यवत्या भृशमर्थी महायशा:॥ ८१॥
कन्यापितृत्वात् किंचित् तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप।
बलवत्सपत‍्‍‍नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम्॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
महाबली राजा शान्तनु ने भी पहले बड़े आग्रह से सत्यवती को माँगा था; किन्तु उनके आग्रह करने पर भी मैंने उनका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था। राजकुमार! कन्या का पिता होने के नाते मैं तुमसे भी अवश्य कुछ कहूँगा। तुम दोनों के बीच जो सम्बन्ध बन रहा है, उसमें मुझे केवल एक ही दोष दिखाई देता है, वह है बलवान के साथ शत्रुता। 81-82।
 
The great king Shantanu had earlier also asked for Satyavati with great insistence; but even after his request I had refused his offer. Prince! Being the father of the girl I will surely say something to you also. I see only one flaw in the relationship that is being formed between you, enmity with the strong. 81-82.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)