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mahabharat 1.100.78: ऐसे अनुकूल और इच्छित विवाह-बंधन को अस्वीकार करके कौन अपने हृदय में दुःखी नहीं होगा? चाहे वह स्वयं इन्द्र ही क्यों न हो ॥78॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  1.100.78 
को हि सम्बन्धकं श्लाघ्यमीप्सितं यौनमीदृशम्।
अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतु:॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
ऐसे अनुकूल और इच्छित विवाह-बंधन को अस्वीकार करके कौन अपने हृदय में दुःखी नहीं होगा? चाहे वह स्वयं इन्द्र ही क्यों न हो ॥78॥
 
Having rejected such a favorable and desirable marriage alliance, who would not feel sorrowful in his heart? Even if he is Indra himself. ॥ 78॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)