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mahabharat 1.100.73: तत्पश्चात् वह तुरन्त ही अपने पिता के हितैषी वृद्ध मंत्री के पास गया और उससे अपने पिता के दुःख का वास्तविक कारण पूछा ॥ 73॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  1.100.73 
अभ्यगच्छत् तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम्।
तमपृच्छत् तदाभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम्॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वह तुरन्त ही अपने पिता के हितैषी वृद्ध मंत्री के पास गया और उससे अपने पिता के दुःख का वास्तविक कारण पूछा ॥ 73॥
 
Thereafter he immediately went to the old minister who was a well-wisher of his father and inquired from him about the real cause of his father's grief. ॥ 73॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)