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mahabharat 1.100.64: 'तुम भी सदैव शस्त्रास्त्रों के अभ्यास में लगे रहते हो और पुरुषार्थ में तत्पर रहते हो। बेटा! मैं इस संसार की अनित्यता से निरन्तर दुःखी और चिन्तित रहता हूँ। 64॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  1.100.64 
शस्त्रनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थित:।
अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
'तुम भी सदैव शस्त्रास्त्रों के अभ्यास में लगे रहते हो और पुरुषार्थ में तत्पर रहते हो। बेटा! मैं इस संसार की अनित्यता से निरन्तर दुःखी और चिन्तित रहता हूँ। 64॥
 
'You too are always engaged in the practice of weapons and are always ready for efforts. Son! I am constantly saddened and worried about the impermanence of this world. 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)