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mahabharat 1.100.62: ‘मैं जानना चाहता हूँ कि आपको कौन-सा रोग हुआ है, जिससे मैं उसका निवारण कर सकूँ।’ पुत्र के ऐसा कहने पर शान्तनु बोले-॥62॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  1.100.62 
व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै।
एवमुक्त: स पुत्रेण शान्तनु: प्रत्यभाषत॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
‘मैं जानना चाहता हूँ कि आपको कौन-सा रोग हुआ है, जिससे मैं उसका निवारण कर सकूँ।’ पुत्र के ऐसा कहने पर शान्तनु बोले-॥62॥
 
'I want to know what disease has afflicted you, so that I may cure it.' When his son said this, Shantanu replied -॥ 62॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)