श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.100.57 
वैशम्पायन उवाच
नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनु:।
शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: हे जनमेजय! राजा शान्तनु काम की तीव्र अग्नि में जल रहे थे, फिर भी उनमें निषाद को वह वरदान देने की इच्छा नहीं थी।
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya! King Shantanu was burning with the intense fire of passion, yet he did not have the desire to grant that boon to Nishad. 57
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)