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mahabharat 1.100.36: भरत! देवता और दानव भी उनका सदैव आदर करते हैं। वे शुक्राचार्य के ज्ञात शास्त्रों को भी भली-भाँति जानते हैं ॥36॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.100.36 
सुराणां सम्मतो नित्यमसुराणां च भारत।
उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद् वेद सर्वश:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
भरत! देवता और दानव भी उनका सदैव आदर करते हैं। वे शुक्राचार्य के ज्ञात शास्त्रों को भी भली-भाँति जानते हैं ॥36॥
 
Bharata! Even the gods and demons always respect him. He is also fully aware of the Shastra (ethics) which Shukracharya knows. ॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)